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भारतीयों के लिए अमेरिका में निवेश हुआ आसान: अब सीधे NSE/BSE प्लेटफॉर्म से खरीद सकेंगे Apple और Tesla के शेयर

By MoneyCal Editorial TeamPublished 2026

Table of Contents

What's New

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सेबी (SEBI) ने मार्च 2026 से लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत विदेशी शेयरों में निवेश करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल और सरल बना दिया है। अब भारतीय निवेशक अपने मौजूदा डीमैट खाते का उपयोग करके एनएसई आईएफएससी (NSE IFSC) प्लेटफार्म के माध्यम से अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों के प्रमुख शेयरों में

Why It Matters

यह बदलाव भारतीय निवेशकों को

  • "भारतीय निवेशकों का पोर्टफोलियो जोखिम (Portfolio Risk) कम होगा।
  • विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) के लेनदेन में आने वाली लागत 50% तक कम होगी।
  • छोटे निवेशकों के लिए ग्लोबल मार्केट्स में प्रवेश की बाधाएं खत्म होंगी।
  • भारतीय रुपए बनाम अमेरिकी डॉलर के उतार-चढ़ाव का लाभ मिलेगा।"
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फ्रैक्शनल इन्वेस्टिंग (Fractional Investing) क्या है?

अमेरिका में एक शेयर की कीमत लाखों रुपयों में हो सकती है (जैसे बर्कशायर हैथवे)।

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TCS (Tax Collected at Source) का नया गणित

अक्टूबर 2023 के नियमों के बाद से ₹7 लाख से अधिक के विदेशी निवेश पर 20% TCS लगता था। 2026 के नए नियमों के तहत, यदि आप केवल निवेश के उद्देश्य से पैसा भेज रहे हैं, तो इस TCS को आपके आधार कार्ड से लिंक कर दिया जाएगा और इसे तुरंत आपके एडवांस टैक्स या टीडीएस (TDS) लायबिलिटी के साथ एडजस्ट किया जा सकेगा, जिससे निवेशकों की नकदी (Cash Flow) ब्लॉक नहीं होगी।

NSE IFSC प्लेटफॉर्म कैसे काम करता है?

यह गिफ्ट सिटी (GIFT City, Gujarat) में स्थित एक विशेष एक्सचेंज है। यहाँ निवेशक सीधे अपने भारतीय बैंक खाते से फंड ट्रांसफर कर सकते हैं और रसीद (DRs) के रूप में अमेरिकी शेयर खरीद सकते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से सेबी के दायरे में आती है, जिससे सुरक्षा की पूरी गारंटी रहती है।

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जोखिम और सावधानियां

विदेशी निवेश में सबसे बड़ा जोखिम

Key Facts & Data

LRS सीमा $250,000 प्रति वर्ष (लगभग ₹2.1 करोड़)
न्यूनतम निवेश शून्य (फ्रैक्शनल शेयर संभव)
प्लेटफॉर्म NSE IFSC, BSE INX, INDmoney, Vested
टैक्स (LTCG) 24 महीने से अधिक पर 12.5% (इंडेक्सेशन के बिना)
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Key Takeaways

  • "केवल परिचित कंपनियों (जैसे Apple, Google, Amazon) से शुरुआत करें।
  • नियमित रूप से डॉलर-कोस्ट एवरेजिंग (SIP) करें ताकि करेंसी के उतार-चढ़ाव का असर कम हो।"